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देखना उनका कनखियों से इधर देखा किये
अपनी आह-ए-कम-असर का हम-असर देखा किये
जो ब-जाहिर हमसे सदियों की मुसाफ़त-बर रहे
हम उन्हें हर गाम अपना हमसफ़र देखा किये
लम्हा लम्हा वक़्त का सैलाब चढ़ता ही गया
रफ़्ता रफ़्ता डूबता हम अपना घर देखा किये
कोई क्या जाने के कैसे हम भरी बरसात में
नज़र-ए-आतिश अपने ही दिल का नगर देखा किये
सुन के वो ''''''''''''''''शहज़ाद'''''''''''''''' के अशआर सर धुनता रहा
थाम कर हम दोनों हाथों से जिगर देखा किये
एक बस तू ही नहीं मुझसे ख़फ़ा हो बैठा
मैंने जो संग तराशा था ख़ुदा हो बैठा
उठ के मंज़िल ही अगर आये तो शायद कुछ हो
शौक़-ए-मंज़िल तो मेरा आब्ला-पा हो बैठा
मसलह्त छीन ली क़ुव्वत-ए-ग़ुफ़्तार मगर
कुछ न कहना ही मेरा मेरी ख़ता हो बैठा
शुक्रिया ऐ मेरे क़ातिल ऐ मसीहा मेरे
ज़हर जो तूने दिया था वो दवा हो बैठा
जान-ए-शहज़ाद को मिन-जुम्ला-ए-आदा पा कर
हूक वो उट्ठी कि जी तन से जुदा हो बैठा
फ़ैसला तुमको भूल जाने का
इक नया ख़ाब है दीवाने का
दिल कली का लरज़ लरज़ उठा
ज़िक्र था फिर बहार आने का
हौसला कम किसी में होता है
जीत कर ख़ुद ही हार जाने का
ज़िंदगी कट गई मनाते हुए
अब इरादा है रूठ जाने का
आप शहज़ाद की न फ़िक्र करें
वो तो आदी है ज़ख़्म खाने का
खुली जो आँख तो वो था न वो ज़माना था
दहकती आग थी तन्हाई थी फ़साना था
ग़मों ने बाँट लिया है मुझे यूँ आपस में
कि जैसे मैं कोई लूटा हुआ ख़ज़ाना था
जुदा है शाख़ से गुल-रुत से आशियाने से
कली का जुर्म घड़ी भर का मुस्कुराना था
ये क्या कि चन्द ही क़दमों में थक के बैठ गये
तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था
मुझे जो मेरे लहू में डबो के गुज़रा है
वो कोई ग़ैर नहीं यार एक पुराना था
ख़ुद अपने हाथ से ''शहज़ाद'' उसको काट दिया
कि जिस दरख़्त की टहनी पे आशियाना था
कोंपलें फिर फूट आईं शाख़ पर कहना उसे
वो न समझा है न समझेगा मगर कहना उसे
वक़्त का तूफ़ान हर इक शय बहा कर ले गया
इतनी तन्हा हो गई है रहगुज़र कहना उसे
जा रहा है छोड़ कर तन्हा मुझे जिसके लिये
चैन न दे पायेगा वो सीम-ओ-ज़र कहना उसे
रिस रहा हो ख़ून दिल से लब मगर हँसते रहे
कर गया बरबाद मुझको ये हुनर कहना उसे
जिसने ज़ख़्मों से मेरा 'शहज़ाद' सीना भर दिया
मुस्करा कर आज प्यारे चारागर कहना उसे
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